अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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यहीं कहीं…(हाइकु)

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[फ़रवरी 2008]

मेरे साथ ही,
यहीं कहीं पास में,
मैं रहता हूं.

मुझसा कोई,
फड़फड़ा रहा है,
मेरी नसों में.

वो कहता है-
अतीत की आवाज़ें,
मेरी ही तो हैं!

मेरी अपनी,
नसों की गुफ़ाओं में,
मैं अटका हूँ.

मेरे लिये भी,
मैं को ज़िंदा रखना,
मजबूरी है.

इन्ही नसों में,
इसी किसी समय,
हाँ, यहीं कहीं.

Douglas HofstadterMarvin MinskyThomas MetzingerHugh Everett को समर्पित

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Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:10 पूर्वाह्न