अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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यूँ होता तो क्या होता?

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[अप्रैल 2008]

बस 15 मिनट ही तो बचे थे. सो भी सकता था वो, पर फिर उसकी ‘कम्प्लीटनेस’ की सनक का क्या होता? अर्द्धजाग्रत अवस्था में ही वो उस थर्ड क्लास फ़िल्म को निपटाने लगा.

गोली की आवाज़ से उसकी आँखें कुछ ज़्यादा ही खुल गयी थीं. चंद सेकेंड वो नैपथ्य में निहारता रहा, फिर जैसे कुछ घबराकर स्क्रीन को देखने लगा. आख़िर उसकी तन्द्रा भंग हुई और उसे इस असीम ज्ञान का बोध हुआ कि अप्रत्याशित रूप से अंत में हीरो ही मारा जाता है!

कहानी यहीं पर ख़त्म हो गयी, और बेचारा लुढ़ककर सो गया. उठने के बाद वो अपने अर्द्धजागरण और शायद उस फ़िल्म को भी बिल्कुल भूल जाएगा…

…और साथ ही उस ख़ून को भी जो उसने अभी-अभी किया था- फ़िल्म के हीरो का! उसके जैसे स्वयंभू वर्ल्ड-सिनेमा प्रेमी को इंप्रेस करने के चक्कर में हमारे हीरो के पात्र को अपनी बलि देनी पड़ी. हीरो को शायद बचाया जा सकता था, अगर वो बस कुछ देर पहले झपक लेता.

(या अगर मुआ मुझ जैसे हाइपर-एक्टिव विज्ञान प्रेमी का दोस्त न होता!)

John Archibald Wheeler को समर्पित

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Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:12 पूर्वाह्न

प्रारम्भिक में प्रकाशित किया गया

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सरेराह

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[मार्च 2008]

मुस्कुरा ही पड़ा था वो.

‘मुस्कुराना’ थोड़ा जेन्टलमैनली लगता है, वरना घिघियाती हुई मरियल सी हँसी ही कह लीजिये. इससे पहले कि आप कोई पारिभाषिक या वैयाकरणीय आपत्ति उठायें, मेरा पल्ला झाड़ डायलॉग सुनिये- लब्बोलुआब ये है कि चेहरे की कौन सी मांसपेशी किस एंगल पर खिंची ये तो नहीं बता सकता, पर वो कुछ ख़ुश ज़रूर हुआ था.

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पूरे शहर में शायद उसी अस्पताल में आज भी सीढ़ियाँ थीं. सरकारी था न. अच्छा है, मैंने सोचा, कल्चर नाम की चिड़िया की बीट और मेरी मैसोक़िस्टिक आरामगाह. यूँ तो सीढ़ियाँ महज धरोहर ही थीं, और इनका इस्तेमाल करने का ख़्याल यहाँ के मरीज़ों को ही आ सकता था, पर किसे फ़ुरसत थी मेरे इस 176 सीढ़ियाँ चढ़ कर आठवें माले तक पहुँचने के कारनामे पर नज़र-ए-इनायत करने की.

“आख़िर ये डोज़ तय कैसे की जाती हैं?… मेरा मतलब मेरी दवाईयों से ही नहीं है. अलां बीमारी का इलाज फलां दवाई की अक्कड़ खुराक़ को बक्कड़ बजे लेने से होगा, ये कौन सा साइंस है? हमारी साली रियल नंबरों को कॉम्प्लेक्स नंबरों का सबस्पेस सिद्ध करने में लग जाती थी, और यहां ये डॉक्टर तो जैसे साइंस की टांगें उठाकर घुड़सवारी करते हैं.”

“तुमने फिर दवा नहीं खाई.”

“तुम पूछ रहे हो या बता रहे हो?”

ख़ैर अब पूछना क्या और बताना क्या? मैंने और कुछ भी बोला तो मेटाफ़िज़िक्स से लेकर होम्योपैथी तक के तर्कों की एक श्रंखला प्रस्तुत हो जायेगी, रहेंगे ढाक में फिर भी तीन ही पात. अपनी खिसियाहट छुपाने के लिये मैंने मीम-रीडर ऑन कर दिया. ऐडल्ट मोड में.

“तुम आख़िर चाहते क्या हो? क्यों ख़ामख़्वाह मुझे हँसाने की कोशिश करते हो? तुम जानते हो न कि मैं ऊब चुका हूँ, पक चुका हूँ मैं. परस्पर समभाव, प्रगतिशील समाज, प्रफुल्लित मानव- घिन आती है मुझे. तुम इसे उन्नति कहते हो, इस स्वतन्त्रता, स्वछ्न्दता, समानता के आलाप को? मेरा इंसान ऐसा नहीं है, वो वहशी है, दुस्साहसी है, सब कुछ है मगर हिजड़ा-”

“-बस करो, बस!” मैं कुछ गरमा सा गया. पिछ्ले कुछ समय से ये सब कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया था. “तुम फिर जी ही क्यों रहे हो?”

वो अक्सर नहीं चौंकता, पर फिर मेरा गरमाना भी अक्सर नहीं होता. हालाँकि वो चौंका भी था इतनी सफ़ाई से कि शायद कोई मनोवैज्ञानिक भी न पकड़ पाता. सेकेन्ड का 10वाँ हिस्सा समझ लीजिये.

और वो मुझे गौर से देखने लगा. मैं समझ गया, 20-25 मिनट तक अब उसकी आँखें मुझसे हटेंगी नहीं. शायद मेरे पिछले डायलॉग ने उसे टर्न ऑन कर दिया था. वक़्त हो चला था हमारे साप्ताहिक सहवास का.

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मैं उसे छोड़ क्यों नहीं देता? आख़िरी सीढ़ी उतरते वक़्त ये सवाल शायद 176वीं बार मेरे जेहन में कौंधा. हालाँकि न तो मेरी बीवी को कोई शिक़ायत थी, न बच्चों को. कुछ लोगों को आपत्ति थी, मगर इसलिये क्योंकि वो दिमागी मरीज़ था, और हमारा सम्बन्ध उसके और मेरे भावनात्मक स्वास्थ्य के लिये घातक हो सकता था. अख़िरकार हम आदर्श युग के बाशिन्दे थे, वो युग जहां सामाजिक न्याय और सम्पन्नता की स्थापना हो चुकी थी. जहां सांइस और सांइटिफ़िक जैसे शब्द इंसान की सोच और काम में रच-बस गये थे. उसके जैसों को छोड़कर सभी ख़ुश थे, और सभी उससे भी कमोबेश ख़ुश ही थे- तभी तो उसे जेल में नहीं, अस्पताल में रखा हुआ था.

ख़ैर, वो सब कुछ छोड़ सकता था, मुझे नहीं. हम जब भी मिलते थे हिन्दी में बातें करते थे. मैं लखनऊ की ‘सिम्बॉलिक लॉजिक‘ प्रयोगशाला में काम करता था और फिर भी मुझे कभी-कभी गुस्सा आता था. मुझे अनएडेड सेक्स पसंद था. ये बातें बहुत सामान्य तो नहीं, असाधारण भी नही थीं, पर इन्हीं सब पर वो फ़िदा था, और मैं उसकी इस अदा पर.

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जानते हो, मैं हमेशा से इसी शहर में रहा हूँ.”- वो बोला. मैं जानता था.

इधर कुछ दिनों से उसका कॉर्टिसॉल नियंत्रण में था, इसलिये बाहर आने की इजाज़त मिल गई. शायद पिछ्ले कई सालों में हम दो पहले ऐसे मानव थे जो इस तरह सड़कों पर चहलकदमी कर रहे हों. टहलने के लिये पार्क थे, बाहर टहलने के लिये रोलर्स. गनीमत थी कि हम नवाबगंज में थे, शहर का बाहरी हिस्सा. ख़ैर, शायद उसका मूड कुछ सुधरे. डॉक्टरों की हिदायत थी कि वो हँसे- हॉर्मोनल इंजेक्शन बेअसर थे, दवाएँ वो खाता नहीं था, और मेरी तीन साल की सारी कोशिशें नाकाम साबित हुई थीं.

वो अपनी छड़ी को सड़क और फ़ुटपाथ के बीच की पतली सी धूमिल रेखा में जितना हो सके गड़ा कर चल रहा था. मुझे कोफ़्त तो हो रही थी, पर उतनी नहीं जितनी उसके कमरे में होती.

“ये, ये क्या कर रहे हो.” मैनें देखा कि वो एक जगह अटक गया था.

“यहाँ कुछ है.” उसका संक्षिप्त सा जवाब था. हाँ, वहाँ शायद कुछ था. कोई धातु का टुकड़ा शायद, अंदर गड़ा हुआ, जिसका एक फ़लक ऊपर झाँक रहा था. क्या वो इस क़दर सनकी हो गया कि किसी ख़ज़ाने की उम्मीद करने लगा?

वो बदस्तूर गाड़ता चला जा रहा था. उसको रोकना तो ख़ैर मेरे बूते के बाहर की बात थी, मैं बस मना रहा था कि जो कुछ भी हो जल्दी बाहर निकले.

मैं पास के लैम्पपोस्ट से टिककर खड़ा हो गया. कोई छोटे से साइनबोर्ड जैसी चीज़ गड़ी थी शायद. हुंह! होगी. जल्दी ही मेरा ध्यान उसके चेहरे की ओर गया, वही उन्माद, पुरानी 2-डी फ़िल्मों के हीरो जैसा, और तभी…

यकीनन वो मुस्कुराया था. चाहे उतनी चौड़ी हँसी नहीं, पर एक आह्लाद ज़रूर था. और इस बार ये मेरा सपना नहीं था.

वो अभी भी नीचे उसी बोर्ड को देख रहा था. मुझे थोड़ी हैरत, थोड़ा रश्क़ सा हुआ. आख़िर मैं झुका, और देखा कि लिखा था-

‘मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं’

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:11 पूर्वाह्न