अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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रात अभी बाक़ी है

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आँखें न बंद करो, के रात अभी बाक़ी है,
मुद्दत से कह रहा जिसे वो बात अभी बाक़ी है.

लहू हमारा भी कभी आँख से टपकता था,
चेहरे की शिकन पर निशानात अभी बाक़ी है.

ये दिल का फितूर है, या ख़लल है दिमाग़ का,
जिस्म तो फ़ना हुआ, जज़्बात अभी बाक़ी है.

सुबह बदरंग थी, दोपहर खाली थी,
शाम भी मायूस गयी, रात अभी बाक़ी है!

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Written by SatyaVrat

सितम्बर 13, 2011 at 9:56 पूर्वाह्न