अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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पीछे देख़ते हुए…(त्रिवेणी)

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[वसंत 2007]

कॉलेज के अंतिम दिनों के दौरान लिखी गई यह ग़ज़ल एक कल्पित व्यक्ति की बानगी है, जो कॉलेज छोड़ने के बरसों बाद उसे याद करता है.

आवाज़ें आती रहती हैं,
कानों में उंगली दो, या रुई के फाहे,
बीते बरसों की चीख़ें नहीं थमतीं.

पैसा है, लड़कियाँ हैं, असबाब है,
पर फ़ुरसत किसे है? और ज़हमत कहाँ है?
वो पहलवान की चाय नहीं है.

नाकारा थे, बड़बोले थे, बुरी लतों के मारे थे,
पर हँसते थे, और गाते थे, मिल बाँट कर खाते थे,
अब तो फ़्रिज में भी चीज़ें सड़ जाया करती हैं.

आजकल ज़ुबान में दर्द बहुत होता है,
कोई इन्फ़ेक्शन हो गया है शायद,
या शायद कई दिनों से गालियाँ नहीं दीं.

पर ज़िंदगी का दस्तूर भी यही है,
आगे चलते जाना है, और नयी मंज़िलें पानी हैं,
अब इसे तो बंक नहीं कर सकते.

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:07 पूर्वाह्न