अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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अतिप्रश्न

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कुछ अतिप्रश्न हाइकु के रूप में. हाइकु कविता कहने का एक जापानी कायदा है. इसमें 3 पंक्तियां होती है, पंक्तियों में क्रमश: 5-7-5 अक्षर; अर्द्धाक्षरों को नहीं गिना जाता. (अंतिम दो पंक्तियों में तुकबंदी एक नया प्रयोग है. पहली पंक्ति एक प्रश्न खड़ा करती है, और शेष उसके दो अलग- अलग संभावित उत्तर हैं)

कविता क्या है?
व्यग्र विचार व्यथा/
लयबद्धता

अस्तित्व क्या है?
डार्विन का सिद्धांत/
वेद- वेदान्त

दर्शन क्या है?
धरती पर बोझ/
सत्य की खोज

जीवन क्या है?
हर पल का मान/
अर्थ का भान

मरण क्या है?
अनंतिम अनंत/
अंतिम अंत

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Written by SatyaVrat

अगस्त 9, 2011 at 8:02 अपराह्न

यहीं कहीं…(हाइकु)

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[फ़रवरी 2008]

मेरे साथ ही,
यहीं कहीं पास में,
मैं रहता हूं.

मुझसा कोई,
फड़फड़ा रहा है,
मेरी नसों में.

वो कहता है-
अतीत की आवाज़ें,
मेरी ही तो हैं!

मेरी अपनी,
नसों की गुफ़ाओं में,
मैं अटका हूँ.

मेरे लिये भी,
मैं को ज़िंदा रखना,
मजबूरी है.

इन्ही नसों में,
इसी किसी समय,
हाँ, यहीं कहीं.

Douglas HofstadterMarvin MinskyThomas MetzingerHugh Everett को समर्पित

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:10 पूर्वाह्न

प्यार तो है (हाइकु)

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[2005]

होठों में हँसी,
दिल में कहीं इक,
दरार तो है.

बेचैन तो हूँ,
बस ख़ुशी है, तुझे-
करार तो है.

मैं बरबाद,
पर तेरे घर में,
बहार तो है.

फ़कीरी में भी
गिला नहीं, ये तेरा-
बाज़ार तो है.

सच कहूँ तो,
तुझे हो न हो, मुझे-
हाँ, प्यार तो है.

वो शायर तो,
गुज़र चुका पर,
मज़ार तो है.

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:04 पूर्वाह्न