अनंतिम

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सुनो मौरोमी

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[दिसंबर 2005]

सुनो मौरोमी…
देखो मैं भले ही अजनबी हूँ,
पर तुम अब अजनबी नहीं मेरे लिए;
पिछले कुछ दिनों में कितना कुछ बदल गया है,
दिल के उस घायल कोने में,
जो ज़िन्दगी की किताब के पीले पड़े पन्ने की तरह नीला पड़ गया था,
और जिसे मैंने बुरी तरह छुपा रखा था,
तुमने गलती से ठोकर मार दी,
तुम्हे तो पता भी नहीं,
उस ठोकर से खून अब भी रिस रहा है,
और ज़मीन पर गिर कर लिख रहा है-

कि सुनो मौरोमी…
माना कि ये सब कुछ सिरफ़िरापन ही लगता है,
(क्या इंसान का वजूद सिरफ़िरे से इतर भी कुछ है?)
ज़िन्दगी की ज़रूरतें, उसूल और मंसूबे-
सब कुछ कितने मशीनी हैं;
मगर कभी अचानक,
जब जूनून की आँधी चुपके से दिल में बारिश कर जाती है,
तो तमाम उम्र का इतिहास भी
इंसान को इंसान बनने से नहीं रोक पाता;
और उस दिन अलस्सुबह,
जब सूरज की रेशमियों ने,
खिड़की को लांघ कर मेरी आँखों को छुआ था,
तो मेरे होठों ने फड़फड़ाकर कहा था-

कि सुनो मौरोमी…
मैं बिलकुल नहीं जानता,
कि कल दोपहर गुनगुनी धुप में भी
मुझे सर्दी क्यों लग रही थी?
और कल रात घने कोहरे में भी
मैं सड़कों पर क्या ढूँढ रहा था?
सारे सवालों के जवाब भले ही हों,
पर सारे जवाबों के सवाल नहीं होते,
और दिल ने जो इतने जवाब दे दिए हैं,
उनके सवाल मुझे कौन बताएगा?
तुम बताओगी न-
तो सुनो मौरोमी…

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Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:05 पूर्वाह्न

प्रारम्भिक में प्रकाशित किया गया

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