अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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प्रीति

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[फ़रवरी 2010]

तुम चाँद के पिछले हिस्से सी,
भूले-बिसरे से किस्से सी,
बीते हुए इक अरसे सी,
कारे बादर बिन बरसे सी,
तुम ख़ुद में खोई-खोई हो,
रतजागी हो, अधसोई हो.

परदे से छनती रौशनी सी,
पत्तल में चिपकी चाशनी सी,
छत पर फैली ओढ़नी सी,
दूर गूँजती रागिनी सी,
कुछ शोख़, कुछ संजीदा हो,
और बाकी कुछ पोशीदा* हो.

*पोशीदा= गुप्त

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:17 पूर्वाह्न