अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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दूसरी दुनिया

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[अक्टूबर 2009]

दूर- दूर सी दूसरी-दूसरी सी दुनिया…
खिलखिलाता सा आसमान, सोंधी मिट्टी ऊँचे मचान,
तंतर- मंतर करती सी तंतरी सी दुनिया…

दूर- दूर सी दूसरी-दूसरी सी दुनिया…
सरसराती नदिया के नीर, तके घाट पर दूर तीर,
उस तीरे पर किलकती कंजरी सी दुनिया…

दूर-दूर दूसरी दिशा से,
बरसों की एकाग्र तृषा से,
दिखती धुआँ-धुआँ सी पलछिन,
दुखती दबे दर्द सी मद्धिम,
दूर नहीं, दूसरी नहीं है,
ये कहीं अभी भी मरी नहीं है,
देखो इस मायादर्पण में,
सब अनचीन्हों के तर्पण में,
कहीं फिसल न जाए ये बजरी सी दुनिया…
दूर- दूर सी दूसरी-दूसरी सी दुनिया…

निर्मल वर्मा को समर्पित

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:16 पूर्वाह्न