अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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एक अदद कम्बस्टेबल (त्रिवेणी)

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[दीवाली 2007]

पिछ्ली दीवालियों में घर पर ‘अंकुर’ तो था,
अबकी दीवाली ‘मैं’ घर पर मनाऊँगा,
…यहाँ आइंडहॊवन के अकेले, अंधेरे कमरे से.

ब्रेक-अप हुए अभी बहुत वक़्त नहीं गुज़रा था,
पर फिर से हम साथ ही जागते और सोते हैं,
…ख़ूबसूरत भी कितनी है कम्बख़्त तन्हाई ये.

रौशन कुछ करने की ख़्वाहिश मेरी भी थी,
ख़ाली बोतल लेकिन भभक-कर बुझ जाती है,
…अरे हाँ! याद आया- शरीर भी कम्बस्टेबल है!

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:08 पूर्वाह्न