अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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एक दिल और हज़ार ट्यूलिप्स (त्रिवेणी)

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[मई 2008]

कल रात कुछ गर्मी थी, मैं खिड़की खोल के सोया था,
सुबह हुई तो नाक के साथ बिस्तर भी गुलाबी था.
… खाँसते- खाँसते मुस्कुराना कोई आसान काम नहीं है.

हुंह! हमेशा की तरह फिर सो जाऊँगा पलटकर,
इस बार शायद कोई बेहतर सपना दीख पड़े.
… उफ़! ज़रा ये कम्बख़्त बलग़म थूक कर आता हूँ.

ये पत्ते, ये रंग, ये ख़ुशबू- सब उस खिड़की से आये थे,
बंद ही कर देता हूं, अब ठंड भी कुछ बढ़ गयी है.
… देर कर दी तो शोर भी आने लगेगा बाहर का.

हिलते हुए ट्यूलिप्स को देख रहा हूँ सुबह से,
और बुरी तरह खाँस रहा हूँ, दवा भी नहीं खायी कोई.
… शायद ट्यूलिप्स भी मुझे देख रहे हों हिलता हुआ.

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Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:13 पूर्वाह्न

एक अदद कम्बस्टेबल (त्रिवेणी)

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[दीवाली 2007]

पिछ्ली दीवालियों में घर पर ‘अंकुर’ तो था,
अबकी दीवाली ‘मैं’ घर पर मनाऊँगा,
…यहाँ आइंडहॊवन के अकेले, अंधेरे कमरे से.

ब्रेक-अप हुए अभी बहुत वक़्त नहीं गुज़रा था,
पर फिर से हम साथ ही जागते और सोते हैं,
…ख़ूबसूरत भी कितनी है कम्बख़्त तन्हाई ये.

रौशन कुछ करने की ख़्वाहिश मेरी भी थी,
ख़ाली बोतल लेकिन भभक-कर बुझ जाती है,
…अरे हाँ! याद आया- शरीर भी कम्बस्टेबल है!

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:08 पूर्वाह्न

पीछे देख़ते हुए…(त्रिवेणी)

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[वसंत 2007]

कॉलेज के अंतिम दिनों के दौरान लिखी गई यह ग़ज़ल एक कल्पित व्यक्ति की बानगी है, जो कॉलेज छोड़ने के बरसों बाद उसे याद करता है.

आवाज़ें आती रहती हैं,
कानों में उंगली दो, या रुई के फाहे,
बीते बरसों की चीख़ें नहीं थमतीं.

पैसा है, लड़कियाँ हैं, असबाब है,
पर फ़ुरसत किसे है? और ज़हमत कहाँ है?
वो पहलवान की चाय नहीं है.

नाकारा थे, बड़बोले थे, बुरी लतों के मारे थे,
पर हँसते थे, और गाते थे, मिल बाँट कर खाते थे,
अब तो फ़्रिज में भी चीज़ें सड़ जाया करती हैं.

आजकल ज़ुबान में दर्द बहुत होता है,
कोई इन्फ़ेक्शन हो गया है शायद,
या शायद कई दिनों से गालियाँ नहीं दीं.

पर ज़िंदगी का दस्तूर भी यही है,
आगे चलते जाना है, और नयी मंज़िलें पानी हैं,
अब इसे तो बंक नहीं कर सकते.

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:07 पूर्वाह्न