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सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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चिहुँकना फिर फिर से…

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[अक्टूबर 2008]

चिहुँकना फिर फिर से,
और सिसकना सारी सारी रात फिर…
ज़रा सा खटका लगा नहीं कि ढह गया घरौंदा जैसे
कभी कभी ही होता है जब शाम नम नहीं होती.

मज़ा तो ये है कि मजाल है कोई आए!
गमक यही है, और शायद ये चिहुँक भी यही,
और जब कभी मज़ा नहीं तो उसकी आरज़ू ही सही!

चिहुँक-चिहुँक के तार तार हुआ जाता हूँ,
सिसक-सिसक के भी बेज़ार हुआ जाता हूँ,
कसक पुरानी है- चिहुँक से भी, सिसक से भी!
(हाँ, जिए हैं कई साल भी; हाँ, किया है थोड़ा कुछ भी)
इन ब्रैकेटों के मुग़ालतों की दरकार हुआ जाता हूँ!

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:14 पूर्वाह्न