अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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गोरी और चंदा

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[2006]

ये कविता उन शोषित नारियों के कृन्दन को महसूस करने का एक प्रयास है, जिनका जीवन पुरुष प्रधान रूढ़िवादी समाज के हाथ की कठपुतली बनकर रह गया है

सूरज मुए से है रंजिश पुरानी,
तो छुप-छुप के रात निकलता है चंदा,
गोरी हटा दे तू मुखड़े से घूँघट,
तेरा ये अपना है- मामा है चंदा,
आधा ही निकला है, सकुचा रहा है,
यूँ न लजा- शर्माता है चंदा,
माटी का दीपक भी पहलू में रखना,
मेघों से कुछ घबराता है चंदा,
हवा भी अचानक ठिठक सी गई है,
परी की कहानी सुनाता है चंदा,
सुबह फिर से दोनों ही तिल-तिल जलेंगे,
अभी तो तू जीले- जिलाता है चंदा.

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:06 पूर्वाह्न