अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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ख़त

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[ग्रीष्म 2004]

इस कागज़ के पन्ने पर,
अंधेरी सी इस रात में,
घरवालों से छुपके,
आखिर हिम्मत करके,
तुम्हे ये ख़त लिख रहा हूँ.
इसे जूनून समझो तुम,
या मुहब्बत बेपनाह,
गुस्ताख़ी नामाकूल,
या नाकाबिलेमाफ़ गुनाह
जो होना है हो जाए अब,
मैं नहीं रुकूंगा कहे बिना.

मैं आँखें तेरी तकता जब,
अल्लाह! क़यामत लगती थीं,
कोई राज़ था शायद गहरा सा!
मैं बेसुध सोचा करता था,
सपना ये कोई सुनहरा सा,
और इर्द गिर्द आँखों के, उफ़!
काली ज़ुल्फों का पहरा सा
तू जब- जब मुझे देखती थी,
मैं खुद को ख़ुदा समझता था,
देखा है बहुत हसीनों को,
पर तुझको जुदा समझता था,
बस गया सा मुझको लगता था,
पलकों में तेरा चेहरा सा.

मैं रंग रूप का सौदाई,
तू रंग रूप की रानी है,
मैं तेरे लिए पहेली हूँ,
तू मेरी प्रेम कहानी है.
लम्हे क्या, दिन क्या, साल गुजारे
हैं तेरे इंतज़ार में,
अब चाहूँ भी तो कैसे भूलूँ,
तेरी सूरत उम्र गुज़ार में,
ये याद रहेगी साथ सदा,
इस दुनिया में, और मज़ार में.

तू मेरे ख़्वाबों की मलिका,
तेरा वजूद ही जादू है,
मेरे दिल में जो बसती है-
वो लड़की तू है, बस तू है.
मोहब्बत सुना था फ़साना है,
बस दिल्लगी का बहाना है,
कमबख़्त दिल्लगी के आगे,
इस दिल ने घुटने टेके थे-
ये दिल तूने बहकाया था,
तूने ही इसे चुराया था,
पर चोरी में ईमान तो रख-
एक दिल था, वो तो चुरा लिया,
नींदे भी तूने चुरा लीं,
अब आँखें तो न चुराया कर!

गैरों पर इतने करम न कर,
मुझपर तू इतने ज़ुल्म न कर,
जब शक हो एक नज़र भर देख,
यकीन कर मेरा, वहम न कर.
तू नज़रें मेरी देखेगी,
तो खुद की सूरत पाएगी,
और धड़कन जो बस सुन लेगी,
तो मुझमें समा जाएगी,
शर्म न कर बस आ भी जा-
अब या तो शर्मिंदगी रहे,
या तेरे संग ज़िन्दगी रहे.

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Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:03 पूर्वाह्न

प्रारम्भिक में प्रकाशित किया गया

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