अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

Posts Tagged ‘कविता

शून्यालाप

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[वीडियो: दिसंबर 2015]

संडे रात चार बजे
मैं छज्जे से रोड को
और पाइथन के कोड को
देख कर सोच रहा कैसे डिबग करूँ?
तारकोल उढ़ेल कर, रूबी को रेल पर
लैपटॉप गोदी और हिंदुस्तान मोदी पर
डाल कर मैं हो गया हूँ पात-पात,
गात माहिं बात करामात,
इंस्टाग्राम व्हाट्सैप
यूपी में गैंगरेप
अर्थशास्त्र-राजनीति-तकनीक-संगीत-कला
शब्दों का सिलसिला
पीला-पीला, पिलपिला
कहीं कहीं लाल भी
रंगों में घिसट-घिसट
बीत गए मिनट-मिनट
घंटे-दिन, दिन-महीने,
साल भी
बालों की खाल भी

सत्य का आह्वान करो-
तो सत्य की सौतेली बहन उत्तर-आधुनिकता
जिसके कमाटीपुर में धुंआधार बिकती है
औने-पौने दाम में
छद्म-बौद्धिकता और इंस्टेंट कामुकता,
मैं बोर हो जाता हूँ पर अघा नहीं पाता
गला भर्राता नहीं
जिया घबराता है
के पन्ना अभी खाली है,
क़सम है मुझे इस उत्तर-आधुनिकता की
विज्ञान की और धर्म की
उस तथाकथित मर्म की
सीरिया की, ईराक़ की
ओबामा, अमर्त्य की
कटे-फटे, लुटे-पिटे, गिरे-पड़े सत्य की
और क़सम उस ख़ुदा की-
के पन्ना ये भरना है,
शब्दों का झरना है
या नाला या सीवर भी
समय का साइफन जाम ठीक कर देगा
मेरा जाम भर देगा
वरना क़सम खाकर शब्दों के झरने की
जाम और चखने की
और क़सम उस ख़ुदा की-
रामकथा बांचन को जामवंत स्वर देगा.

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केजरीवालों को संबोधित

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[ये कविता किसी व्यक्ति विशेष को नहीं, बल्कि उस अनगढ़ उत्साह को संबोधित है जो कोरी बौद्धिकता से बाज़ आ चूका है! ये अनगढ़पन यदा कदा बचकाना या फासीवादी तक होने का भ्रम पैदा कर सकता है,  पर जब तक सरल-सैद्धांतिक-समीकरण की नीति कायम है- हम अनुमोदन करते रहेंगे.]

तुम ऐसे ही जूझते जाओगे..

तब, जबकि हम अपनी रणनीतियाँ बनायेंगे,
टीकों और टिप्पणियों के चाबुक चलाएँगे,
फिर उसी से खुद की पीठ थपथपाएंगे
..तुम धूप को छीलते जाओगे

हम स्कूल और वाद के विवाद करेंगे,
शाम को महफ़िलें आबाद करेंगे,
जामों में क्रान्ति की मियाद करेंगे
..तुम पानी के कुल्ले कराओगे

हम तुम्हारी खुशफहमियों पर हँसेंगे,
तुम्हारे लड़कपन पर फब्तियां कसेंगे,
फिर चमकते अल्फ़ाज़ों के बिस्तर में धसेंगे
..तुम जागोगे और सबको जगाओगे

हम पेंग्विनों में अपनी किताबें छपाते हैं,
हार्वर्डों में पढ़ते, जेएनयूओं में पढ़ाते हैं,
जब दर्द बढ़ता है तो पेनकिलर खाते हैं
..तुम सहोगे, फिर सहलाओगे

आख़िरी आदमी

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[ये कविता श्री कृष्ण कलम्ब को समर्पित है, जो वर्हाडी (मराठी की एक उपभाषा) में कविता करते थे. उनका बेहतर परिचय ये है कि वो विदर्भ के उस सर्वहारा वर्ग से थे जो बरसों से अत्यंत दारुण परिस्थितियों में गुज़र करने को अभिशप्त है- ये कवितायेँ नहीं उनका आर्तनाद है. उनकी तीन छोटी कवितायें आप यहाँ, यहाँ, और यहाँ सुन सकते हैं.
जिस समाज में ऐसा गहरा इंसान अपना जीवन समाप्त करने को विवश हो जाए, उस समाज की नंगाई अपनी तमाम वीभत्सता के साथ आँखों के सामने नाचने लगती है!]

आख़िरी आदमी नंगे पत्थरों पर लेटता है,
पसीना बिखेरता है, राख को समेटता है,
आदिम हँसी हँसता है, कंकड़ों से खेलता है.
हमारी मतलबी और बेमतलब बातों की कड़ी,
टूटती कमर और तोड़ती लातों की कड़ी-
के आख़िर में आख़िरी आदमी है!

आख़िरी आदमी झूठ नहीं बोलता- बस बोलता नहीं,
वो सहता है, सुनता है, तुलता है, पर तौलता नहीं,
कड़ियों में जा जुड़ता है, कुछ जोड़ता नहीं.
हमारे सारे फ़लसफ़ों और वाद की कड़ी,
अधपकी तमन्नाओं की फ़रियाद की कड़ी-
के आख़िर में आख़िरी आदमी है!

आख़िरी आदमी का हाड़-माँस भी वही है,
लहू भी वही है और सांस भी वही है,
फांसें कुछ अलग हैं- पर प्यास भी वही है.
हम आख़िर से पहले वालों की कड़ी,
हमारे नपुंसक इन दुनियावी सवालों की कड़ी-
के आख़िर में आख़िरी आदमी है..

पर इस आख़िरी आदमी का महज़ होना-
ये आख़िर तक फैली आदमीयत है?
या आदमी की आख़िरीयत है?

बिम्ब

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मेरी भूख अभी तक मिटी नहीं,
जो पास में कुछ लकड़ियाँ पड़ी हैं-
गीली हैं.
सूखने की आस में बैठा हूँ,
उथली मिट्टी का चूल्हा हूँ.

मेरे तीर सभी बेपैने हैं,
खाली तरकश लेकर सर्कस में
निकला हूँ.
कुछ झूले मैं भी झूला हूँ,
मैं भी सर्कस का झूला हूँ.

मैं याद कर रहा हूँ तुमको,
और याद में छुपकर पहुँचा हूँ
गले तुम्हारे-
हिचकी बनकर जा अटका हूँ,
बाकी सब कबका भूला हूँ.

मैं चिंगारियां चबाता हूँ,
पीता हूँ रौशनियाँ, बिजलियों को-
खाता हूँ.
मेरे अन्दर की आग है ये!
या के बस आगबबूला हूँ?

Written by SatyaVrat

नवम्बर 12, 2011 at 8:38 अपराह्न

अतिप्रश्न

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कुछ अतिप्रश्न हाइकु के रूप में. हाइकु कविता कहने का एक जापानी कायदा है. इसमें 3 पंक्तियां होती है, पंक्तियों में क्रमश: 5-7-5 अक्षर; अर्द्धाक्षरों को नहीं गिना जाता. (अंतिम दो पंक्तियों में तुकबंदी एक नया प्रयोग है. पहली पंक्ति एक प्रश्न खड़ा करती है, और शेष उसके दो अलग- अलग संभावित उत्तर हैं)

कविता क्या है?
व्यग्र विचार व्यथा/
लयबद्धता

अस्तित्व क्या है?
डार्विन का सिद्धांत/
वेद- वेदान्त

दर्शन क्या है?
धरती पर बोझ/
सत्य की खोज

जीवन क्या है?
हर पल का मान/
अर्थ का भान

मरण क्या है?
अनंतिम अनंत/
अंतिम अंत

Written by SatyaVrat

अगस्त 9, 2011 at 8:02 अपराह्न

मेरा दुख

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[अक्टूबर 2010]

मेरा दुख उस होने का दुख है,
जैसे उफ़नाते हुए अस्तित्व के बीच गहरे से भंवर का होना-
मंझधार में होकर भी नहीं,
जिसमें अटककर मेरी शिराओं में बहता हुआ खून चक्रवात बन गया है,
जो इस प्रवाह से बिलकुल अलहदा है
फिर भी अपने झंझोड़ से आंदोलित करता है धारा को,
जो विलीन न हो जाने की ज़िद किये बैठा है
और जलरश्मियों की करताल पर रूठा है,
जो मंझधार की तड़प में सूख-सूख जाता है,
प्रियतम के विराग से क्लांत है
बाहर से स्थितप्रज्ञ, पर भीतर आक्रांत है.

पर भंवर से समागम कर,
तरंगित, श्रंगारित बही धारा
पहले से अम्लान है,
कुछ सहमी, कुछ सकुची तो है-
पर देखो कैसी खिल सी आई है,
प्रवाह में निश्चय ही मिलेगी
चाहे थोड़ी देर से ही सही-
पर उद्गम की आशाओं से ईमानदार.

सतत ये प्रवाह जो जीवन जैसा अनंतिम है,
सत्यव्रती सोपान से इस भंवर-
जैसा है मेरा दुख.

Written by SatyaVrat

मई 20, 2011 at 12:48 पूर्वाह्न

रंग

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[अक्टूबर 2010]

लोग काले और सफ़ेद में सोचते हैं,
पर सब नहीं- कुछेक और रंगों में भी सोच लेते हैं,
लाल, हरे, नीले… मोम के कलर बॉक्स के बारह रंगों में,
सभी इतने में नहीं मानते-
वो पानी वाले चौबीस रंगों का डिब्बा रखते हैं,
उनमें से कुछ कलाकार जोड़-घटा और मिला-जुला कर और भी रंग बना लेते हैं,
और,
कुछ नए शोहदे अलां और फलां क्रोमेटिक रंगों से सैकड़ों-हज़ारों रंग तैयार करते हैं.

हाँ, शायद इतने ही रंगों में रंगी है ये दुनिया,
या के बाकी जो कुछ बचे भी हैं वो सब गैरज़रूरी हैं!

Written by SatyaVrat

मई 19, 2011 at 11:48 अपराह्न