अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

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केजरीवालों को संबोधित

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[ये कविता किसी व्यक्ति विशेष को नहीं, बल्कि उस अनगढ़ उत्साह को संबोधित है जो कोरी बौद्धिकता से बाज़ आ चूका है! ये अनगढ़पन यदा कदा बचकाना या फासीवादी तक होने का भ्रम पैदा कर सकता है,  पर जब तक सरल-सैद्धांतिक-समीकरण की नीति कायम है- हम अनुमोदन करते रहेंगे.]

तुम ऐसे ही जूझते जाओगे..

तब, जबकि हम अपनी रणनीतियाँ बनायेंगे,
टीकों और टिप्पणियों के चाबुक चलाएँगे,
फिर उसी से खुद की पीठ थपथपाएंगे
..तुम धूप को छीलते जाओगे

हम स्कूल और वाद के विवाद करेंगे,
शाम को महफ़िलें आबाद करेंगे,
जामों में क्रान्ति की मियाद करेंगे
..तुम पानी के कुल्ले कराओगे

हम तुम्हारी खुशफहमियों पर हँसेंगे,
तुम्हारे लड़कपन पर फब्तियां कसेंगे,
फिर चमकते अल्फ़ाज़ों के बिस्तर में धसेंगे
..तुम जागोगे और सबको जगाओगे

हम पेंग्विनों में अपनी किताबें छपाते हैं,
हार्वर्डों में पढ़ते, जेएनयूओं में पढ़ाते हैं,
जब दर्द बढ़ता है तो पेनकिलर खाते हैं
..तुम सहोगे, फिर सहलाओगे

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Written by SatyaVrat

जून 7, 2013 at 5:27 अपराह्न