अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

मेरा दुख

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[अक्टूबर 2010]

मेरा दुख उस होने का दुख है,
जैसे उफ़नाते हुए अस्तित्व के बीच गहरे से भंवर का होना-
मंझधार में होकर भी नहीं,
जिसमें अटककर मेरी शिराओं में बहता हुआ खून चक्रवात बन गया है,
जो इस प्रवाह से बिलकुल अलहदा है
फिर भी अपने झंझोड़ से आंदोलित करता है धारा को,
जो विलीन न हो जाने की ज़िद किये बैठा है
और जलरश्मियों की करताल पर रूठा है,
जो मंझधार की तड़प में सूख-सूख जाता है,
प्रियतम के विराग से क्लांत है
बाहर से स्थितप्रज्ञ, पर भीतर आक्रांत है.

पर भंवर से समागम कर,
तरंगित, श्रंगारित बही धारा
पहले से अम्लान है,
कुछ सहमी, कुछ सकुची तो है-
पर देखो कैसी खिल सी आई है,
प्रवाह में निश्चय ही मिलेगी
चाहे थोड़ी देर से ही सही-
पर उद्गम की आशाओं से ईमानदार.

सतत ये प्रवाह जो जीवन जैसा अनंतिम है,
सत्यव्रती सोपान से इस भंवर-
जैसा है मेरा दुख.

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Written by SatyaVrat

मई 20, 2011 at 12:48 पूर्वाह्न

प्रारम्भिक में प्रकाशित किया गया

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रंग

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[अक्टूबर 2010]

लोग काले और सफ़ेद में सोचते हैं,
पर सब नहीं- कुछेक और रंगों में भी सोच लेते हैं,
लाल, हरे, नीले… मोम के कलर बॉक्स के बारह रंगों में,
सभी इतने में नहीं मानते-
वो पानी वाले चौबीस रंगों का डिब्बा रखते हैं,
उनमें से कुछ कलाकार जोड़-घटा और मिला-जुला कर और भी रंग बना लेते हैं,
और,
कुछ नए शोहदे अलां और फलां क्रोमेटिक रंगों से सैकड़ों-हज़ारों रंग तैयार करते हैं.

हाँ, शायद इतने ही रंगों में रंगी है ये दुनिया,
या के बाकी जो कुछ बचे भी हैं वो सब गैरज़रूरी हैं!

Written by SatyaVrat

मई 19, 2011 at 11:48 अपराह्न

प्रारम्भिक में प्रकाशित किया गया

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सवा शायरी

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पिछले कुछ दिनों से एक नया चस्का लगा है- पहुँचे हुए शायरों के पहुँचे हुए शेर पढ़ना, और उसी रौ में शेर की (बे)तुकबंदी करता हुआ अपना एक अदना सा शेर जड़ देना. तुर्रा ये कि नाचीज़ ने इस ‘विधा’ का बाक़ायादा नामकरण भी कर दिया है; ढिठाई की सारी मिसालों को नीचा दिखाता हुआ नाम- ‘सवा शेर’.

तो साहेबान पेश-ए-ख़िदमत हैं ऐसे कुछ सवा शेर. जिनके शेरों की हजामत बनाई गई है उन शायरों से माफ़ी मांगना तो उनकी ठंडी आहों को क्या ही गर्म करेगा, पर शऊर भी कोई चीज़ होती है, है न? तो जैसे कि मुज़फ्फ़र वारसी इस शेर में ग़ालिब से क्षमा-याचना करते हैं, मेरी भी गुस्ताख़ी माफ़ कीजिएगा.

“ग़ालिब तेरी ज़मीन में लिखी तो है ग़ज़ल,

तेरे क़द-ए-सुख़न के बराबर नहीं हूँ मैं”

(ज़मीन~style; क़द-ए-सुख़न~level of eloquence)

सवा शेर दाहिनी तरफ़ हैं-

 

“एक दिन तुझसे मिलने ज़रूर आऊँगा,

ज़िंदगी मुझको तेरा पता चाहिए”- बशीर बद्र

“शहर यही है शायद, मोहल्ला, गली भी,

यहीं- कहीं घर है तेरा, रास्ता चाहिए”

 

“वो मेरे सामने ही गया और मैं

रास्ते की तरह देखता रह गया”- वसीम बरेलवी

“कनखियों से जो देखा था मुड़कर मुझे,

रात भर फिर सड़क पर खड़ा रह गया”

 

“इक तुम ही नहीं तन्हा, उल्फ़त में मेरी रुसवा

इस शहर में तुम जैसे दीवाने हज़ारों हैं”- शहरयार

(उल्फ़त~intense love)

“बस इतनी गुज़ारिश है, तू तो न इम्तिहां ले

यूँ भी तो ज़िंदगी में पैमाने हजारों हैं”

 

“नक़ाब उलटे हुए गुलशन से वो जब भी गुज़रता है

समझ के फूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है”- मुनव्वर राना

“उठी रहती हैं पलकें इस क़दर उस राह को तकते

ख़फ़ा होकर के इस आलम से पुतली बैठ जाती है”

 

“ये इनायतें ग़ज़ब की, ये बला की मेहरबानी

मेरी ख़ैरियत भी पूछी किसी और की ज़ुबानी”- नज़ीर बनारसी

(इनायतें~benignity)

“तेरी आवाज़ का था सुनना, और मेरा ग़श खाके गिरना

तू जो गुनगुना रही थी मेरी वो ग़ज़ल पुरानी”

 

“हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा

यही क़िस्मत हमारी है सितारों तुम तो सो जाओ”- क़तील शिफ़ाई

(शब~night)

“सुबह से दौड़-धूप और शोरोगुल में जो दबे से थे

अब उन दर्दों की बारी है सितारों तुम तो सो जाओ”

 

“ये हक़ीक़त है कि होता है असर बातों में

तुम भी खुल जाओगे दो-चार मुलाक़ातों में”- सईद राही

“माना के तू है संगदिल पर मैं भी कम नहीं

शिद्दत अभी बहुत है इस दिल के जज़्बातों में”

(संगदिल~heartless; शिद्दत~passion)

 

“ये आधी रात को फिर चूड़ियाँ सी क्या खनकती हैं

कोई आता है या मेरी ही ज़ंजीरें छनकती हैं”- प्रेम वरबर्तोंनी

“मेरा दिल उल्फ़तों और वहशतों का क़ैदख़ाना है

जहाँ साँसें क़यामत की परस्तिश में सिसकती हैं”

(वहशत~insanity; परस्तिश~servitude)

 

“चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले

कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले”- अमजद इस्लाम अमजद

“घर तेरा था तो चंद क़दमों की दूरी पर

मिलने निकले तुझे तो कितने ज़माने निकले”

तिश्नगी

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[मार्च 2010]

साँझ के बाद की ये तिश्नगी* पुरानी है,
ख़ुदा नये हैं पर ये बंदगी पुरानी है.

*तिश्नगी=प्यास

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सितम्बर 3, 2010 at 12:18 पूर्वाह्न

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प्रीति

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[फ़रवरी 2010]

तुम चाँद के पिछले हिस्से सी,
भूले-बिसरे से किस्से सी,
बीते हुए इक अरसे सी,
कारे बादर बिन बरसे सी,
तुम ख़ुद में खोई-खोई हो,
रतजागी हो, अधसोई हो.

परदे से छनती रौशनी सी,
पत्तल में चिपकी चाशनी सी,
छत पर फैली ओढ़नी सी,
दूर गूँजती रागिनी सी,
कुछ शोख़, कुछ संजीदा हो,
और बाकी कुछ पोशीदा* हो.

*पोशीदा= गुप्त

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:17 पूर्वाह्न

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दूसरी दुनिया

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[अक्टूबर 2009]

दूर- दूर सी दूसरी-दूसरी सी दुनिया…
खिलखिलाता सा आसमान, सोंधी मिट्टी ऊँचे मचान,
तंतर- मंतर करती सी तंतरी सी दुनिया…

दूर- दूर सी दूसरी-दूसरी सी दुनिया…
सरसराती नदिया के नीर, तके घाट पर दूर तीर,
उस तीरे पर किलकती कंजरी सी दुनिया…

दूर-दूर दूसरी दिशा से,
बरसों की एकाग्र तृषा से,
दिखती धुआँ-धुआँ सी पलछिन,
दुखती दबे दर्द सी मद्धिम,
दूर नहीं, दूसरी नहीं है,
ये कहीं अभी भी मरी नहीं है,
देखो इस मायादर्पण में,
सब अनचीन्हों के तर्पण में,
कहीं फिसल न जाए ये बजरी सी दुनिया…
दूर- दूर सी दूसरी-दूसरी सी दुनिया…

निर्मल वर्मा को समर्पित

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:16 पूर्वाह्न

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पानी-पानी

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[ग्रीष्म 2009]

हम लोग तो पानी को
ऊपर से पीते हैं
नीचे से बहाते हैं
और कुछ हमारे आका हैं
जो इसमें चीनी घोल के
लाखों कमाते हैं
वो मुआ कौन है-
जो पानी पीके
फ़ौरन
नीचे से नहीं बहाता है
और वहाँ साइड में जाके
अपना मगज खपाता है
चीनी भी नहीं घोलता
लाखों भी नहीं कमाता है
ये हमारी और आकाओं की
अमानत में ख़यानत है
पानी और चीनी की-
लानत मलानत है
हमें बस पानी को
पानी-पानी कर डालना है
या तो चीनी घोलना
या नीचे से निकालना है.

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:15 पूर्वाह्न

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