अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

बिम्ब

with 4 comments

मेरी भूख अभी तक मिटी नहीं,
जो पास में कुछ लकड़ियाँ पड़ी हैं-
गीली हैं.
सूखने की आस में बैठा हूँ,
उथली मिट्टी का चूल्हा हूँ.

मेरे तीर सभी बेपैने हैं,
खाली तरकश लेकर सर्कस में
निकला हूँ.
कुछ झूले मैं भी झूला हूँ,
मैं भी सर्कस का झूला हूँ.

मैं याद कर रहा हूँ तुमको,
और याद में छुपकर पहुँचा हूँ
गले तुम्हारे-
हिचकी बनकर जा अटका हूँ,
बाकी सब कबका भूला हूँ.

मैं चिंगारियां चबाता हूँ,
पीता हूँ रौशनियाँ, बिजलियों को-
खाता हूँ.
मेरे अन्दर की आग है ये!
या के बस आगबबूला हूँ?

Written by SatyaVrat

नवम्बर 12, 2011 at 8:38 अपराह्न

4 Responses

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  1. Great stuff! Almost there…

    अनाम

    नवम्बर 12, 2011 at 9:41 अपराह्न

  2. thanks! where?🙂

    SatyaVrat

    नवम्बर 12, 2011 at 9:59 अपराह्न

  3. Mil gaye bhai tumhare blog finally…why did you stop writing on your previous blogs?

    अनाम

    नवम्बर 14, 2011 at 3:12 अपराह्न

  4. oh, but I did put this blog’s link in the upper right side of the old blog!

    SatyaVrat

    नवम्बर 14, 2011 at 6:13 अपराह्न


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