अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

तिश्नगी

with 3 comments

[मार्च 2010]

साँझ के बाद की ये तिश्नगी* पुरानी है,
ख़ुदा नये हैं पर ये बंदगी पुरानी है.

*तिश्नगी=प्यास

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:18 पूर्वाह्न

3 Responses

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  1. Jab aap “Tishnagi” ko “Saangh Ke Baad” se milate hain to aisa lagane lagata hai ki aap urdu kaviyon ke sarvakalik “AAH AAH Vaad”, jismen lagbhag samoochi urdu kavita pichle 200-250 varshon se aahen bharte, usansen lete aur karahate huye aatmapeedan se aatmasukha ka lutpha uthate huye gadgadyaman hoti rahi hai, se vanchit na ho jane ke liye kafi vyagra hain. Ek baat aur, na to yeh Khuda naya hai aur na hi yeh Bandagi nayi ya purani hai. Are, yeh sab purane zamon se chalte aa rahe khote sikkon ke donon khote pahioo hain.

    AnandVardhanDwivedi

    अगस्त 24, 2010 at 11:50 पूर्वाह्न

    • प्रणाम द्विवेदी अंकल,

      सांझ के साथ तिश्नगी की वैयाकरणीय उपयुक्तता को लेकर तो मैं शुरू में कुछ हद तक सशंकित था, पर इस ‘आह-आह वाद’ की ऐतिहासिक परम्परा को लेकर मेरे मन में लेशमात्र भी श्रद्धा का भाव न था, न है. पहली दुविधा भी जब- तब चली ही जाती, जैसे की अपनी रचनाओं में पूर्णविराम (|) की अनिवार्यता और बिंदु व चन्द्र-बिंदु में विभेद चलता कर दिया. और इससे पहले कि में उर्दू के पितरों के तर्पण के बारे में सोचता भी, मुक्तिबोध मुझसे कह गए-
      ‘जो कुछ है उससे बेहतर चाहिए,
      दुनिया साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए.’

      और ये नयेपन का जो ठीकरा है, वो नव-प्रवेशियों के सर ही क्यों फूटता है? जबकि आज भी ‘विभाजन कि त्रासदी’ से लेकर ‘अहो ग्राम्य जीवन’ के बीच में झूलते, और ‘कन्नौज की बोली’, ‘मथुरा की गाली’ सरीखे चहबच्चों में बटे हुए मनीषियों को संस्कृति का साक्षात बताया जाता है. फिर इस बार तो मुक्तिबोध को माथा टेकने की नौबत भी नहीं आई, खुद का लिखा हुआ ही कुछ याद आ गया-
      ‘नया तो पल है,
      और पलों की मसनद पर ये सपनीली दुनिया सजी है,
      सपनीली दुनिया की मसनद
      आंऽऽऽ
      चलो धोकर आते हैं.’
      (https://anantim.wordpress.com/2010/03/25/naya-saal/)

      चरण स्पर्श.

      SatyaVrat

      अगस्त 26, 2010 at 3:41 पूर्वाह्न

      • Priya Ankur,
        Isase pahle ki main tumhari kavitaon ya ki tippaniyon par apni tippaniyan darz kar sakoon, mujhe yeh sikhao ki is “Leave a reply” mein kya karoon ki ise main Roman mein likhoon aur yeh swayamewa Hindi (Devnagari) mein roopantarit hota jaye, jaisa ki email mein ho jata hai. Ya yeh ki tum kya / kaise karte ho ki tum Devnagari mein pratyuttarit kar pate ho.

        AnandVardhanDwivedi

        सितम्बर 9, 2010 at 3:51 अपराह्न


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