अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

सैनिक

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[कारगिल युद्ध के दौर में ]

बैठा था निशब्द, निर्वाक कि तभी एक हुंकार सुनी,
‘युद्धक्षेत्र में जाना तुमको’- उसने एक पुकार सुनी,
मातृभूमि की इस पुकार पर माता के रक्षार्थ उठा,
उठा देख माँ को संकट में, शत्रु के भक्षार्थ उठा,
विचलित नहीं हुआ किंचित भी, चल पड़ा विद्युत गति से,
वीरों का नाता मृत्यु से- कामदेव का जो रति से.

तभी अचानक ठिठक पड़ा वह, आया याद उसे अतीत,
बीती बातों की चुभन, ह्रदय में उसको हुई प्रतीत,
उसने सोचा पत्नी उसके बिन कितना रोती होगी!
कैसे वे अबोध बच्चियाँ बिना पिता सोती होंगी!
उसने सोचा कैसे अम्मा यादें सँजोती होगी!
युवा पुत्र के बिना पिता को भी पीड़ा होती होगी!
उसे याद आया जब बहना राखी-तिलक लगाती थी,
उसे याद आया जब दादी लोरी उसे सुनाती थी,
उसे याद आया वो मेला जहाँ वो अक्सर जाता था,
उसे याद आया वो मंदिर जहाँ नवाता माथा था.
साल रही थी उसको यादें, वह हो भाव विह्वल उठा,
तन तो वज्र सा कठोर था- पर मन उसका पिघल उठा.

तभी अचानक उसे लगा कि तम में एक प्रकाश हुआ,
उसके डूबे अंतर्मन में जैसे कोई उल्लास हुआ,
अपने मन के गहरेपन से उसने एक पुकार सुनी,
‘उठो वीर! मोह अब त्यागो!’ वीरोचित हुंकार सुनी.
‘तुम हर प्रहर देश के प्रहरी, यश तुम्हारा महान है,
क्यों भूलते तुमसे सबकी आन, बान, सम्मान है,
नहीं अकेले हो तुम हर भारतीय तुम्हारा भ्राता है,
देश ही है अब तात तुम्हारा देश तुम्हारी माता है,
पर्वत को भी पिघला दो तुम ऐसी ज्वाला ह्रदय जले,
इतने बलशाली होकर भी दबे हुए क्यों मोह तले?’

सुनकर वह भर गया ओज से, ह्रदय में इक भूचाल उठा,
कसी मुट्ठियाँ, भींचा जबड़ा, लहू में उसके उबाल उठा,
समझ गया वह मातृभूमि है सबसे ऊपर, सर्वमहान,
अब तत्पर था करने को वह इसके हित सब कुछ बलिदान,
चला अडिग होकर फिर करने युद्ध में वह शत्रुदमन,
और राष्ट्र के महायज्ञ में कर दिए फिर प्राण हवन.

वह था मातृभूमि का रक्षक, देश का सपूत निर्भीक,
कौन महान है उससे जो प्राणों से माने राष्ट्र अधिक?
न था वो हिन्दू, न मुस्लिम, न ईसाई, न ही सिख,
मेरा तुमको कोटि नमन-हे भारत के वीर सैनिक.

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:01 पूर्वाह्न

9 Responses

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  1. बहुत अच्छे
    हिंदी ब्लॉग जगत में स्वागत …

    aakash raj

    फ़रवरी 25, 2010 at 8:37 अपराह्न

  2. बेहतरीन रचना है। इसकी तारीफ करने के लिये मेरे शब्दकोश में कोई शब्द नहीं है

  3. बैठा था निशब्द, निर्वाक कि तभी एक हुंकार सुनी,
    ‘युद्धक्षेत्र में जाना तुमको’- उसने एक पुकार सुनी,
    मातृभूमि की इस पुकार पर माता के रक्षार्थ उठा,
    उठा देख मां को संकट में, शत्रु के भक्षार्थ उठा,
    विचलित नहीं हुआ किंचित भी, चल पड़ा विद्युत गति से,
    वीरों का नाता मृत्यु से- कामदेव का जो रति से.
    Bahut sundar!

    shama

    फ़रवरी 25, 2010 at 10:56 अपराह्न

  4. welcome first, your expression and emotions r great and superb

    jayantijain

    फ़रवरी 26, 2010 at 8:48 पूर्वाह्न

  5. आपकी लेखनी को नमन की वीर सपूतों की याद दिलाई .
    आपका स्वागत है !

    RAJ SINH

    मार्च 3, 2010 at 2:22 अपराह्न

  6. इस नए चिट्ठे के साथ आपको हिंदी चिट्ठा जगत में आपको देखकर खुशी हुई .. सफलता के लिए बहुत शुभकामनाएं !!


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