अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

एक दिल और हज़ार ट्यूलिप्स (त्रिवेणी)

with 2 comments

[मई 2008]

कल रात कुछ गर्मी थी, मैं खिड़की खोल के सोया था,
सुबह हुई तो नाक के साथ बिस्तर भी गुलाबी था.
… खाँसते- खाँसते मुस्कुराना कोई आसान काम नहीं है.

हुंह! हमेशा की तरह फिर सो जाऊँगा पलटकर,
इस बार शायद कोई बेहतर सपना दीख पड़े.
… उफ़! ज़रा ये कम्बख़्त बलग़म थूक कर आता हूँ.

ये पत्ते, ये रंग, ये ख़ुशबू- सब उस खिड़की से आये थे,
बंद ही कर देता हूं, अब ठंड भी कुछ बढ़ गयी है.
… देर कर दी तो शोर भी आने लगेगा बाहर का.

हिलते हुए ट्यूलिप्स को देख रहा हूँ सुबह से,
और बुरी तरह खाँस रहा हूँ, दवा भी नहीं खायी कोई.
… शायद ट्यूलिप्स भी मुझे देख रहे हों हिलता हुआ.

Written by SatyaVrat

सितम्बर 3, 2010 at 12:13 पूर्वाह्न

2 Responses

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  1. ये वाली बेहतर लगी ….. बधाई

    padmsingh

    मार्च 19, 2010 at 4:39 अपराह्न


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