आख़िरी आदमी
[ये कविता श्री कृष्ण कलम्ब को समर्पित है, जो वर्हाडी (मराठी की एक उपभाषा) में कविता करते थे. उनका बेहतर परिचय ये है कि वो विदर्भ के उस सर्वहारा वर्ग से थे जो बरसों से अत्यंत दारुण परिस्थितियों में गुज़र करने को अभिशप्त है- ये कवितायेँ नहीं उनका आर्तनाद है. उनकी तीन छोटी कवितायें आप यहाँ, यहाँ, और यहाँ सुन सकते हैं.
जिस समाज में ऐसा गहरा इंसान अपना जीवन समाप्त करने को विवश हो जाए, उस समाज की नंगाई अपनी तमाम वीभत्सता के साथ आँखों के सामने नाचने लगती है!]
आख़िरी आदमी नंगे पत्थरों पर लेटता है,
पसीना बिखेरता है, राख को समेटता है,
आदिम हँसी हँसता है, कंकड़ों से खेलता है.
हमारी मतलबी और बेमतलब बातों की कड़ी,
टूटती कमर और तोड़ती लातों की कड़ी-
के आख़िर में आख़िरी आदमी है!
आख़िरी आदमी झूठ नहीं बोलता- क्योंकि वो बोलता नहीं,
वो सहता है, सुनता है, तुलता है, पर तौलता नहीं,
कड़ियों में जा जुड़ता है, कुछ जोड़ता नहीं.
हमारे सारे फ़लसफ़ों और वाद की कड़ी,
अधपकी तमन्नाओं की फ़रियाद की कड़ी-
के आख़िर में आख़िरी आदमी है!
आख़िरी आदमी का हाड़-माँस भी वही है,
लहू भी वही है और सांस भी वही है,
फांसें कुछ अलग हैं- पर प्यास भी वही है.
हम आख़िर से पहले वालों की कड़ी,
हमारे नपुंसक इन दुनियावी सवालों की कड़ी-
के आख़िर में आख़िरी आदमी है..
पर इस आख़िरी आदमी का महज़ होना-
ये आख़िर तक फैली आदमीयत है?
या आदमी की आख़िरीयत है?
बिम्ब
मेरी भूख अभी तक मिटी नहीं,
जो पास में कुछ लकड़ियाँ पड़ी हैं-
गीली हैं.
सूखने की आस में बैठा हूँ,
उथली मिट्टी का चूल्हा हूँ.
मेरे तीर सभी बेपैने हैं,
खाली तरकश लेकर सर्कस में
निकला हूँ.
कुछ झूले मैं भी झूला हूँ,
मैं भी सर्कस का झूला हूँ.
मैं याद कर रहा हूँ तुमको,
और याद में छुपकर पहुँचा हूँ
गले तुम्हारे-
हिचकी बनकर जा अटका हूँ,
बाकी सब कबका भूला हूँ.
मैं चिंगारियां चबाता हूँ,
पीता हूँ रौशनियाँ, बिजलियों को-
खाता हूँ.
मेरे अन्दर की आग है ये!
या के बस आगबबूला हूँ?
रात अभी बाक़ी है
आँखें न बंद करो, के रात अभी बाक़ी है,
मुद्दत से कह रहा जिसे वो बात अभी बाक़ी है.
लहू हमारा भी कभी आँख से टपकता था,
चेहरे की शिकन पर निशानात अभी बाक़ी है.
ये दिल का फितूर है, या ख़लल है दिमाग़ का,
जिस्म तो फ़ना हुआ, जज़्बात अभी बाक़ी है.
सुबह बदरंग थी, दोपहर खाली थी,
शाम भी मायूस गयी, रात अभी बाक़ी है!
अतिप्रश्न
कुछ अतिप्रश्न हाइकु के रूप में. हाइकु कविता कहने का एक जापानी कायदा है. इसमें 3 पंक्तियां होती है, पंक्तियों में क्रमश: 5-7-5 अक्षर; अर्द्धाक्षरों को नहीं गिना जाता. (अंतिम दो पंक्तियों में तुकबंदी एक नया प्रयोग है. पहली पंक्ति एक प्रश्न खड़ा करती है, और शेष उसके दो अलग- अलग संभावित उत्तर हैं)
कविता क्या है?
व्यग्र विचार व्यथा/
लयबद्धता
अस्तित्व क्या है?
डार्विन का सिद्धांत/
वेद- वेदान्त
दर्शन क्या है?
धरती पर बोझ/
सत्य की खोज
जीवन क्या है?
हर पल का मान/
अर्थ का भान
मरण क्या है?
अनंतिम अनंत/
अंतिम अंत
सत्यव्रत
[अक्टूबर 2010]
मेरा दुख उस होने का दुख है,
जैसे उफ़नाते हुए अस्तित्व के बीच गहरे से भंवर का होना-
मंझधार में होकर भी नहीं,
जिसमें अटककर मेरी शिराओं में बहता हुआ खून चक्रवात बन गया है,
जो इस प्रवाह से बिलकुल अलहदा है
फिर भी अपने झंझोड़ से आंदोलित करता है धारा को,
जो विलीन न हो जाने की ज़िद किये बैठा है
और जलरश्मियों की करताल पर रूठा है,
जो मंझधार की तड़प में सूख-सूख जाता है,
प्रियतम के विराग से क्लांत है
बाहर से स्थितप्रज्ञ, पर भीतर आक्रांत है.
पर भंवर से समागम कर,
तरंगित, श्रंगारित बही धारा
पहले से अम्लान है,
कुछ सहमी, कुछ सकुची तो है-
पर देखो कैसी खिल सी आई है,
प्रवाह में निश्चय ही मिलेगी
चाहे थोड़ी देर से ही सही-
पर उद्गम की आशाओं से ईमानदार.
सतत ये प्रवाह जो जीवन जैसा अनंतिम है,
सत्यव्रती सोपान से इस भंवर-
जैसा है मेरा दुख.
रंग
[अक्टूबर 2010]
लोग काले और सफ़ेद में सोचते हैं,
पर सब नहीं- कुछेक और रंगों में भी सोच लेते हैं,
लाल, हरे, नीले… मोम के कलर बॉक्स के बारह रंगों में,
सभी इतने में नहीं मानते-
वो पानी वाले चौबीस रंगों का डिब्बा रखते हैं,
उनमें से कुछ कलाकार जोड़-घटा और मिला-जुला कर और भी रंग बना लेते हैं,
और,
कुछ नए शोहदे अलां और फलां क्रोमेटिक रंगों से सैकड़ों-हज़ारों रंग तैयार करते हैं.
हाँ, शायद इतने ही रंगों में रंगी है ये दुनिया,
या के बाकी जो कुछ बचे भी हैं वो सब गैरज़रूरी हैं!
सवा शायरी
पिछले कुछ दिनों से एक नया चस्का लगा है- पहुँचे हुए शायरों के पहुँचे हुए शेर पढ़ना, और उसी रौ में शेर की (बे)तुकबंदी करता हुआ अपना एक अदना सा शेर जड़ देना. तुर्रा ये कि नाचीज़ ने इस ‘विधा’ का बाक़ायादा नामकरण भी कर दिया है; ढिठाई की सारी मिसालों को नीचा दिखाता हुआ नाम- ‘सवा शेर’.
तो साहेबान पेश-ए-ख़िदमत हैं ऐसे कुछ सवा शेर. जिनके शेरों की हजामत बनाई गई है उन शायरों से माफ़ी मांगना तो उनकी ठंडी आहों को क्या ही गर्म करेगा, पर शऊर भी कोई चीज़ होती है, है न? तो जैसे कि मुज़फ्फ़र वारसी इस शेर में ग़ालिब से क्षमा-याचना करते हैं, मेरी भी गुस्ताख़ी माफ़ कीजिएगा.
“ग़ालिब तेरी ज़मीन में लिखी तो है ग़ज़ल,
तेरे क़द-ए-सुख़न के बराबर नहीं हूँ मैं”
(ज़मीन~style; क़द-ए-सुख़न~level of eloquence)
सवा शेर दाहिनी तरफ़ हैं-
“एक दिन तुझसे मिलने ज़रूर आऊँगा,
ज़िंदगी मुझको तेरा पता चाहिए”- बशीर बद्र
“शहर यही है शायद, मोहल्ला, गली भी,
यहीं- कहीं घर है तेरा, रास्ता चाहिए”
“वो मेरे सामने ही गया और मैं
रास्ते की तरह देखता रह गया”- वसीम बरेलवी
“कनखियों से जो देखा था मुड़कर मुझे,
रात भर फिर सड़क पर खड़ा रह गया”
“इक तुम ही नहीं तन्हा, उल्फ़त में मेरी रुसवा
इस शहर में तुम जैसे दीवाने हज़ारों हैं”- शहरयार
(उल्फ़त~intense love)
“बस इतनी गुज़ारिश है, तू तो न इम्तिहां ले
यूँ भी तो ज़िंदगी में पैमाने हजारों हैं”
“नक़ाब उलटे हुए गुलशन से वो जब भी गुज़रता है
समझ के फूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है”- मुनव्वर राना
“उठी रहती हैं पलकें इस क़दर उस राह को तकते
ख़फ़ा होकर के इस आलम से पुतली बैठ जाती है”
“ये इनायतें ग़ज़ब की, ये बला की मेहरबानी
मेरी ख़ैरियत भी पूछी किसी और की ज़ुबानी”- नज़ीर बनारसी
(इनायतें~benignity)
“तेरी आवाज़ का था सुनना, और मेरा ग़श खाके गिरना
तू जो गुनगुना रही थी मेरी वो ग़ज़ल पुरानी”
“हमें तो आज की शब पौ फटे तक जागना होगा
यही क़िस्मत हमारी है सितारों तुम तो सो जाओ”- क़तील शिफ़ाई
(शब~night)
“सुबह से दौड़-धूप और शोरोगुल में जो दबे से थे
अब उन दर्दों की बारी है सितारों तुम तो सो जाओ”
“ये हक़ीक़त है कि होता है असर बातों में
तुम भी खुल जाओगे दो-चार मुलाक़ातों में”- सईद राही
“माना के तू है संगदिल पर मैं भी कम नहीं
शिद्दत अभी बहुत है इस दिल के जज़्बातों में”
(संगदिल~heartless; शिद्दत~passion)
“ये आधी रात को फिर चूड़ियाँ सी क्या खनकती हैं
कोई आता है या मेरी ही ज़ंजीरें छनकती हैं”- प्रेम वरबर्तोंनी
“मेरा दिल उल्फ़तों और वहशतों का क़ैदख़ाना है
जहाँ साँसें क़यामत की परस्तिश में सिसकती हैं”
(वहशत~insanity; परस्तिश~servitude)
“चाँद के साथ कई दर्द पुराने निकले
कितने ग़म थे जो तेरे ग़म के बहाने निकले”- अमजद इस्लाम अमजद
“घर तेरा था तो चंद क़दमों की दूरी पर
मिलने निकले तुझे तो कितने ज़माने निकले”
