अनंतिम

सत्यव्रत की हिंदी/हिंदुस्तानी रचनाएँ

केजरीवालों को संबोधित

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[ये कविता किसी व्यक्ति विशेष को नहीं, बल्कि उस अनगढ़ उत्साह को संबोधित है जो कोरी बौद्धिकता से बाज़ आ चूका है! ये अनगढ़पन यदा कदा बचकाना या फासीवादी तक होने का भ्रम पैदा कर सकता है,  पर जब तक सरल-सैद्धांतिक-समीकरण की नीति कायम है- हम अनुमोदन करते रहेंगे.]

तुम ऐसे ही जूझते जाओगे..

तब, जबकि हम अपनी रणनीतियाँ बनायेंगे,
टीकों और टिप्पणियों के चाबुक चलाएँगे,
फिर उसी से खुद की पीठ थपथपाएंगे
..तुम धूप को छीलते जाओगे

हम स्कूल और वाद के विवाद करेंगे,
शाम को महफ़िलें आबाद करेंगे,
जामों में क्रान्ति की मियाद करेंगे
..तुम पानी के कुल्ले कराओगे

हम तुम्हारी खुशफहमियों पर हँसेंगे,
तुम्हारे लड़कपन पर फब्तियां कसेंगे,
फिर चमकते अल्फ़ाज़ों के बिस्तर में धसेंगे
..तुम जागोगे और सबको जगाओगे

हम पेंग्विनों में अपनी किताबें छपाते हैं,
हार्वर्डों में पढ़ते, जेएनयूओं में पढ़ाते हैं,
जब दर्द बढ़ता है तो पेनकिलर खाते हैं
..तुम सहोगे, फिर सहलाओगे

Goonj: एक जुगलबंदी

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[नवम्बर 2012]

पिछले नवम्बर में मैंने और एक मित्र राम्या ने जागा, बैंगलोर में एक काव्यात्मक जुगलबंदी की. राम्या अंग्रेज़ी में कप्लेट पढ़तीं, और मैं उसका जवाब हिंदी में देता. पेश है वो मज़ेदार जुगलबंदी:

 

Why do I need just one home
Why cant I just freely roam?

चिड़ियों को नहीं देखा तुमने?
वो भी तो उड़ती हैं, और घोसला भी बनाती हैं!

I see the birds, I see their flight
But my own confines become my plight

ये जो ख़्वाब हैं- यही तुम्हारे पंख हैं!
..इन्हें ज़रा सा फड़फड़ाओ तो!

They are dangerous, these dreams you know
They might take my heart in tow

बहने वाला पानी देखो सूखता नहीं,
चलने वाली हवाएं कभी सीलती नहीं,
और कुछ खोजता हुआ राही कहीं खोता नहीं!

It is true that I will be much happier when I flow
But there is so much baggage I have to first let go

सीने में दबी उलझनें पतंग की डोर हैं-
ढील देना.. पर डोर न छोड़ देना

Will this string be my grounding, my connection to a base
So I don’t lose myself in a never ending chase?

हाँ, ये डोर फिर बहाना है बस
इस मुहँ बाए आकाश को कहीं से तो नापना शुरू करने की कोशिश

Yes we need a locus, a point of reference
Originating from where, the rest can make sense

नापना- जोखना ही हार है, जीत है, ख़ुशी है, ग़म भी है,
और हाँ अभी तो तुम भी हो.. हाँ अभी तो हम भी हैं!

Written by SatyaVrat

जून 6, 2013 at 2:24 पूर्वाह्न

आख़िरी आदमी

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[ये कविता श्री कृष्ण कलम्ब को समर्पित है, जो वर्हाडी (मराठी की एक उपभाषा) में कविता करते थे. उनका बेहतर परिचय ये है कि वो विदर्भ के उस सर्वहारा वर्ग से थे जो बरसों से अत्यंत दारुण परिस्थितियों में गुज़र करने को अभिशप्त है- ये कवितायेँ नहीं उनका आर्तनाद है. उनकी तीन छोटी कवितायें आप यहाँ, यहाँ, और यहाँ सुन सकते हैं.
जिस समाज में ऐसा गहरा इंसान अपना जीवन समाप्त करने को विवश हो जाए, उस समाज की नंगाई अपनी तमाम वीभत्सता के साथ आँखों के सामने नाचने लगती है!]

आख़िरी आदमी नंगे पत्थरों पर लेटता है,
पसीना बिखेरता है, राख को समेटता है,
आदिम हँसी हँसता है, कंकड़ों से खेलता है.
हमारी मतलबी और बेमतलब बातों की कड़ी,
टूटती कमर और तोड़ती लातों की कड़ी-
के आख़िर में आख़िरी आदमी है!

आख़िरी आदमी झूठ नहीं बोलता- क्योंकि वो बोलता नहीं,
वो सहता है, सुनता है, तुलता है, पर तौलता नहीं,
कड़ियों में जा जुड़ता है, कुछ जोड़ता नहीं.
हमारे सारे फ़लसफ़ों और वाद की कड़ी,
अधपकी तमन्नाओं की फ़रियाद की कड़ी-
के आख़िर में आख़िरी आदमी है!

आख़िरी आदमी का हाड़-माँस भी वही है,
लहू भी वही है और सांस भी वही है,
फांसें कुछ अलग हैं- पर प्यास भी वही है.
हम आख़िर से पहले वालों की कड़ी,
हमारे नपुंसक इन दुनियावी सवालों की कड़ी-
के आख़िर में आख़िरी आदमी है..

पर इस आख़िरी आदमी का महज़ होना-
ये आख़िर तक फैली आदमीयत है?
या आदमी की आख़िरीयत है?

बिम्ब

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मेरी भूख अभी तक मिटी नहीं,
जो पास में कुछ लकड़ियाँ पड़ी हैं-
गीली हैं.
सूखने की आस में बैठा हूँ,
उथली मिट्टी का चूल्हा हूँ.

मेरे तीर सभी बेपैने हैं,
खाली तरकश लेकर सर्कस में
निकला हूँ.
कुछ झूले मैं भी झूला हूँ,
मैं भी सर्कस का झूला हूँ.

मैं याद कर रहा हूँ तुमको,
और याद में छुपकर पहुँचा हूँ
गले तुम्हारे-
हिचकी बनकर जा अटका हूँ,
बाकी सब कबका भूला हूँ.

मैं चिंगारियां चबाता हूँ,
पीता हूँ रौशनियाँ, बिजलियों को-
खाता हूँ.
मेरे अन्दर की आग है ये!
या के बस आगबबूला हूँ?

Written by SatyaVrat

नवम्बर 12, 2011 at 8:38 अपराह्न

रात अभी बाक़ी है

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आँखें न बंद करो, के रात अभी बाक़ी है,
मुद्दत से कह रहा जिसे वो बात अभी बाक़ी है.

लहू हमारा भी कभी आँख से टपकता था,
चेहरे की शिकन पर निशानात अभी बाक़ी है.

ये दिल का फितूर है, या ख़लल है दिमाग़ का,
जिस्म तो फ़ना हुआ, जज़्बात अभी बाक़ी है.

सुबह बदरंग थी, दोपहर खाली थी,
शाम भी मायूस गयी, रात अभी बाक़ी है!

Written by SatyaVrat

सितम्बर 13, 2011 at 9:56 पूर्वाह्न

अतिप्रश्न

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कुछ अतिप्रश्न हाइकु के रूप में. हाइकु कविता कहने का एक जापानी कायदा है. इसमें 3 पंक्तियां होती है, पंक्तियों में क्रमश: 5-7-5 अक्षर; अर्द्धाक्षरों को नहीं गिना जाता. (अंतिम दो पंक्तियों में तुकबंदी एक नया प्रयोग है. पहली पंक्ति एक प्रश्न खड़ा करती है, और शेष उसके दो अलग- अलग संभावित उत्तर हैं)

कविता क्या है?
व्यग्र विचार व्यथा/
लयबद्धता

अस्तित्व क्या है?
डार्विन का सिद्धांत/
वेद- वेदान्त

दर्शन क्या है?
धरती पर बोझ/
सत्य की खोज

जीवन क्या है?
हर पल का मान/
अर्थ का भान

मरण क्या है?
अनंतिम अनंत/
अंतिम अंत

Written by SatyaVrat

अगस्त 9, 2011 at 8:02 अपराह्न

सत्यव्रत

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[अक्टूबर 2010]

मेरा दुख उस होने का दुख है,
जैसे उफ़नाते हुए अस्तित्व के बीच गहरे से भंवर का होना-
मंझधार में होकर भी नहीं,
जिसमें अटककर मेरी शिराओं में बहता हुआ खून चक्रवात बन गया है,
जो इस प्रवाह से बिलकुल अलहदा है
फिर भी अपने झंझोड़ से आंदोलित करता है धारा को,
जो विलीन न हो जाने की ज़िद किये बैठा है
और जलरश्मियों की करताल पर रूठा है,
जो मंझधार की तड़प में सूख-सूख जाता है,
प्रियतम के विराग से क्लांत है
बाहर से स्थितप्रज्ञ, पर भीतर आक्रांत है.

पर भंवर से समागम कर,
तरंगित, श्रंगारित बही धारा
पहले से अम्लान है,
कुछ सहमी, कुछ सकुची तो है-
पर देखो कैसी खिल सी आई है,
प्रवाह में निश्चय ही मिलेगी
चाहे थोड़ी देर से ही सही-
पर उद्गम की आशाओं से ईमानदार.

सतत ये प्रवाह जो जीवन जैसा अनंतिम है,
सत्यव्रती सोपान से इस भंवर-
जैसा है मेरा दुख.

Written by SatyaVrat

मई 20, 2011 at 12:48 पूर्वाह्न

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